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क्या हो गा अगर पूरी दुनिया एक देश हो जाए | What if the world was a single country?

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क्या हो गा अगर पूरी दुनिया एक देश हो जाए | What if the world was a single country?

जब आप अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखते हैं, तो आप उन 241 देशों और प्रांतो को नहीं देखते, जिनमें हमने अपने आप को बाँटा हुआ है। क्या हो गा अगर पूरी दुनिया एक देश हो जाए What if the world was a single country? आप वो सीमायें नहीं देखते जो हमने ख़ून-ख़राबे से तराश कर बनायीं हैं, या फिर वो विरोधी विचारधाराएँ जो इन सीमाओं के दोनों तरफ फैली हुई हैं।

आप बस एक बहुत बड़ी चट्टान देखते हैं एक ऐसी प्रजाति का घर जिसमें अपने आप को अलग करने की क्षमता है।

दोस्तो, चलिए आज जानते है कि जब क्या होगा अगर पूरी दुनिया एक देश हो जाये? What if the world was a single country? दूसरे विश्व युद्ध के बाद जहाँ मनुष्य ने विश्व की तीन फीसदी आबादी को ख़त्म कर दिया था ग्लोबल लीडर्स ने पूरे विश्व में एक सरकार होने के विचार पर चर्चा करनी शुरू कर दी थी

जिससे की वो गलतियां फिर से न दोहराई जाएँ जो पिछले 25 सालों में हुई थी लेकिन ये विचार तुरंत ही असफल हो गया पर वे कुछ तो सोच रहे होंगे।

आप देख रहे हैं हमारी वेबसाइट का आर्टिकल ‘‘onlineearningprogram’’

क्या हो गा अगर पूरी दुनिया एक देश हो जाए What if the world was a single country?

सदियों से, नेता एक ऐसे दिन की कल्पना कर रहे हैं।जब विश्व शांति एक सच्चाई होगी। पर, जब तक देश एक दूसरे से राजनितिक और धार्मिक असमानताओं के लिए लड़ते रहेंगे, ऐसा होने की सम्भावना बहुत कम लगती है।

अगर हम विश्व के सारे देशों को मिला कर एक बहुत बड़ा देश बना दें तो? निश्चित ही, कुछ भी लड़ने के लिए नहीं बचेगा, है ना? ये इतना आसान नहीं होगा।

ऐसा नहीं है की हमें काफी पहले से शुरुआत करनी होगी, बल्कि, हम कई सालों के सांस्कृतिक इतिहासों, पूर्वधारणाओं, भाषाओ और मुद्राओं को लेंगे और उन्हें एक साथ मिला देंगे।

ये मानव जाति द्वारा किया हुआ अब तक का सबसे कठिन प्रयास होगा, तो इससे पहले की हम इस ओर बढ़ें, शायद हमें इसके फायदे और नुकसान के बारे में और सोचना चाहिए और खुद से पूछना चाहिए की क्या ये करना असल में सही होगा?

इसके अच्छी तरफ से शुरू करते हुए, पूरे विश्व को एक देश बनाने का सबसे पहला फायदा ये होगा की हम पृथ्वी की दिक्कतों का एक संगठित शक्ति बन के सामना कर सकते हैं।

एक जगह जहाँ हम इस फायदे को सबसे ज़्यादा देखेंगे, वो है हमारे ग्रह की क्लाइमेट चेंज के खिलाफ जंग में। उदाहरण के लिए, 2015 में, पेरिस क्लाइमेट एग्रीमेंट के तहत यूनाइटेड स्टेट्स और चाइना दोनों ने अपने ग्रीन हाउस गैस एमिशन्स को सख्त रूप से कम करने का संकल्प लिया था।


तब से, चाइना ने अपने लक्ष्य में बने रहने के लिए, स्वच्छ ऊर्जा के स्रोतों में ज़्यादा पैसा लगाया, जबकि यूनाइटेड स्टेट्स अपने कमिटमेंट से बाहर हो गया है।

एक वैश्विक सरकार हमें एक ग्लोबल प्लान (Blobal Plan) बनाने की अनुमति देकर, की हम कैसे अपने पर्यावरणीय परिस्थिति में सुधार करें, और ये सुनिश्चित करते हुए की इसका समान रूप से पालन हो, इस तरह के फर्क को दूर कर सकती है।

ये संगठित शक्ति मुश्किल के वक्त जैसे की प्राकृतिक आपदाओं और बीमारी की महामारी, या युद्ध में भी काम में आएगी। इन आपदाओं को विकसित देशों से ज़्यादा विकासशील देशों पर अपना असर नहीं दिखाना पड़ेगा।

संसाधनों को हर तरफ फैला कर ये सुनिश्चित किया जा सकता है की सबको इनसे उबरने के समान अवसर मिल रहे हैं।

अगला बड़ा फायदा ये होगा की युद्ध अब ख़त्म किये जा सकेंगे क्यूँकि युद्धों के शुरू होने की सबसे मूल वजह ही लगभग ख़त्म हो जाएगी क्योंकि सारे देश तब एक हो गए होंगे।

कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है की मानव जाति के ज़िंदा रहने के लिए, युद्ध का ख़त्म होना बहुत ज़रूरी है। ऐसा अनुमानित है की अभी इस ग्रह पर 17,000 न्युक्लीअर हथियार हैं जो फ्रांस, चीन, यू.एस., रूस, पाकिस्तान, इसराइल, भारत, यूके और नार्थ कोरिया के पास हैं।

अगर न्युक्लीअर हथियार फिर से इस्तेमाल किये गए, तो हम सब को नुकसान पहुंचेगा, चाहे युद्ध कहीं भी हो रहा हो।
एक वैश्विक सरकार होने से तीसरी अच्छी चीज़ ये होगी की पूरे विश्व में जीवन स्तर का एक बेहतर संतुलन होगा।

शुरुआत के लिए, युद्ध न होने से, रक्षा बजट काफी हद तक कम हो जायेंगे, जिससे बाकी ज़रूरतों, जैसे ग्लोबल हेल्थकेयर के लिए ज़्यादा पैसे उपलब्ध होंगे।

जब सब एक ही सरकार को रिपोर्ट करेंगे और समान नियमों का पालन करेंगे, तो मानवीय अधिकारों को बचाना आसान होगा और विश्व के हर भाग में सुरक्षित लेबर स्टैंडर्ड्स को सेट किया जा सकेगा।

एक वैश्विक देश का मतलब होगा एक वैश्विक मुद्रा, जिसका मतलब होगा चाइना जैसे विकसित देशों की आर्थिक शक्ति में कमी।

मुद्रा विनिमय ना होने की वजह से, चाइना के पास विश्व बाजार में अपने सामानों और सेवाओं को कम मूल्य पर बेचने का कोई तरीका नहीं होगा और ना ही इसकी ज़रूरत होगी।

इसे ख़त्म करने का मतलब होगा कंपनियों को एक उचित हिस्सा देना,चाहे वो विश्व में जहाँ भी हों। विकासशील देश इसका फायदा उठा सकते हैं, हालाँकि ऐसा रातों-रात नहीं होगा।

पूरा विश्व एक देश बन जाये तो क्या नुकसान होंगे ?

अब, एक वैश्विक सरकार इस बात की गारंटी नहीं दे सकती की ग्रह पर सब कुछ अच्छा होगा, और ये हमें इसके नुकसान पर ले आता है।

सबसे पहला, और शायद सबसे ज़रूरी ‘नुकसान’ ये होगा की किसी गलत व्यक्ति को इस पूरे ग्रह की ज़िम्मेदारी दी जा सकती है।

उन्हें चुनने के लिए, लगभग हर पूर्व देश से एक वोट की ज़रूरत होगी, पर उस पद के लिए चुनाव प्रसार शायद वैसे ही होंगे जैसे हम आज के चुनावों में देखते हैं।

ज़ाहिर है, दिक्कतें हों सकती हैं, और हम करप्शन और बैकरूम डीलिंग्स की संभावना से इंकार नहीं कर सकते। कौन कह सकता है की हम एक ऐसे लीडर को नहीं चुन सकते जिनके दिमाग में बुरे भाव न हों?

नाज़ी राजनैतिक धारणा प्रणाली का एक मूल सिद्धांत एक वैश्विक सरकार बनाना था, जो की उनके केस में, और ज़्यादा जनसंहार और दुनिया भर के लोकतंत्र को मिटाना था जिससे वो लोगों में अपनी राजनैतिक विचारधारा जबरदस्ती लागू कर सकें।

हमारी दूसरी दिक्कत ये होगी की राष्ट्रीयता का विचार खो जायेगा। राष्ट्रीयता संस्कृतियों का विकास करती है, और एक तकनीकी विकास 
जैसी चीज़ों को पाने के लिए मांग और ज़रूरत को बढ़ाती है।

यू.एस. और रूस के बीच अंतरिक्ष की रेस के बारे में, और जिस तरीके से इसने अंतरिक्ष की खोज की एक वैश्विक इच्छा को प्रभावित किया है, उसे सोचें। और खेल प्रतियोगिताओं में जीतने पर आपका जो सर ऊँचा होता है, उसे न भूलें।

पर अब जब हम उसके बारे में सोच रहे हैं, तो राष्ट्रीयता ना होने से कुछ अच्छी चीज़ भी हो सकती है। राष्ट्रीयता ना होने का मतलब है की लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ेगा की वो कहाँ से हैं और वो सांस्कृतिक और धार्मिक असमानताओं को आसानी से अपना सकते हैं, जिससे लड़ाई की कम संभावना हो।

शायद ये सबसे अच्छा रहेगा की हम इससे आगे बढ़ जाएँ। एक आखरी नुकसान ये होगा की ये सब बहुत ज़्यादा कठिन होगा और इससे और ज़्यादा वैश्विक मतभेद हों सकते हैं। सारे विश्व को एक देश बनाना एक मुश्किल कार्य होगा।

हम सबको एक सार्वजनिक भाषा, जिसका इस्तेमाल करना है, उसे चुन कर उसको अपनाना होगा और शायद उससे भी अधिक बड़ी समस्या एक सार्वजनिक मुद्रा को चुनने की होगी।

मौजूदा मुद्राओं को कब तक
स्वीकार किया जायेगा?

हम क्या बना सकते हैं जो नयी मुद्रा को प्रिंट करने के लिए और उसके बँटवारे को जाँचने के लिए हो? काफी सारी चीज़े हैं। इस सब से ऊपर, एक तथ्य ये भी है की अभी भी विश्व जनसँख्या के ऐसे कई सारे लोग होंगे, जो विश्व में एक सरकार होने के विचार को नहीं मानेंगे।

बेशक, हम सब एक ही छत के नीचे रह रहे होंगे, पर वो छत विद्रोहों, फैले हुए करप्शन, और सांस्कृतिक टकराव की हो सकती है।

ऐसी लड़ाईया, जिनसे हम सबसे पहले बचना चाहते थे। ये विचार कागज़ पर तो बहुत अच्छा लगता है, पर ये सोचकर की मौजूदा राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्र कितने असंतुलित हैं, तो हर देश को इसके लिए तैयार करने के लिए, उन्हें बहुत विश्वास दिलाने की ज़रूरत होगी।

शायद इसके लिए सबको तैयार करने में, एक तीसरे विश्व युद्ध की ज़रूरत होगी, और तब तक बहुत देर हो जाएगी।

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